
Omar Abdullah Divorce: जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनकी पत्नी पायल अब्दुल्ला का करीब तीन दशक पुराना वैवाहिक रिश्ता अब कानूनी रूप से समाप्त हो गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को आपसी सहमति से तलाक की मंजूरी दे दी। लंबे समय से अलग रह रहे इस दंपति ने अदालत को बताया कि उन्होंने आपसी बातचीत और मध्यस्थता के बाद अपने सभी वैवाहिक विवाद सुलझा लिए हैं और अब विवाह समाप्त करने का संयुक्त फैसला लिया है। यह मामला कई वर्षों से अदालतों में लंबित था। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने उमर अब्दुल्ला की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।
17 साल से अलग रह रहे थे दोनों
उमर अब्दुल्ला और पायल अब्दुल्ला पिछले लगभग 17 वर्षों से अलग रह रहे थे। लंबे समय तक दोनों के बीच वैवाहिक विवाद चलता रहा और मामला अदालत तक पहुंच गया। कई दौर की सुनवाई और मध्यस्थता के बाद दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अब साथ रहना संभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त आवेदन देकर विवाह समाप्त करने की इच्छा जताई। अदालत ने दोनों की सहमति को देखते हुए तलाक की मंजूरी दे दी।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो उमर अब्दुल्ला की ओर से पेश हुए, ने अदालत को बताया कि दोनों पक्षों ने इस महीने की शुरुआत में अनुच्छेद 142 के तहत संयुक्त आवेदन दाखिल किया था। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि दोनों ने मध्यस्थता के दौरान सभी विवादों का समाधान कर लिया है। इसके बाद न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने विवाह को आपसी सहमति से समाप्त करने की अनुमति दे दी।
क्या है अनुच्छेद 142?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को विशेष परिस्थितियों में “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए व्यापक अधिकार देता है। इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए अदालत कई बार उन मामलों में भी राहत देती है, जहां सामान्य कानूनी प्रक्रिया से समाधान कठिन हो। इस मामले में भी अदालत ने दोनों पक्षों की सहमति और लंबे समय से अलग रहने की स्थिति को देखते हुए विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्यों ठुकराई थी याचिका?
इससे पहले उमर अब्दुल्ला ने विवाह समाप्त करने के लिए दिल्ली की पारिवारिक अदालत में याचिका दायर की थी। हालांकि, पारिवारिक अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट का कहना था कि प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर क्रूरता के आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं और तलाक देने का पर्याप्त आधार नहीं बनता। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
कैसे हुई थी उमर और पायल की मुलाकात?
उमर अब्दुल्ला और पायल की मुलाकात दिल्ली के ओबेरॉय होटल में हुई थी। उस समय दोनों वहीं कार्यरत थे। दोनों के बीच दोस्ती हुई, जो बाद में प्रेम संबंध में बदल गई। वर्ष 1994 में दोनों ने विवाह किया। शादी के बाद उनके दो बेटे हुए, जिनके नाम जहीर और जमीर हैं। शुरुआती वर्षों में उनका वैवाहिक जीवन सामान्य रहा, लेकिन बाद में दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे और अंततः वे अलग रहने लगे।
300 करोड़ रुपये की एलिमनी का दावा
सुनवाई के दौरान एक चरण में उमर अब्दुल्ला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में आरोप लगाया था कि पायल अब्दुल्ला ने भारी भरकम एलिमनी की मांग की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश में इस संबंध में कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया। बाद में दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिए समझौते पर पहुंचे और विवाह समाप्त करने के लिए संयुक्त आवेदन दायर किया। इसलिए इस दावे पर अदालत की कोई अंतिम टिप्पणी नहीं आई।
लंबी कानूनी लड़ाई का अंत
यह मामला कई वर्षों तक अदालतों में चलता रहा। इस दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान दोनों से कहा था कि यदि संभव हो तो बातचीत के जरिए विवाद समाप्त करें। अदालत ने उम्मीद जताई थी कि दोनों पक्ष गंभीरता से समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगे। आखिरकार मध्यस्थता सफल रही और दोनों ने वैवाहिक संबंध समाप्त करने पर सहमति बना ली।
निजी जीवन और सार्वजनिक जिम्मेदारी
उमर अब्दुल्ला देश के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में शामिल हैं और वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री हैं। राजनीतिक जीवन के साथ-साथ उनका निजी जीवन भी लंबे समय से चर्चा का विषय रहा। हालांकि उन्होंने कभी भी इस विवाद पर सार्वजनिक रूप से ज्यादा टिप्पणी नहीं की और कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा जताया। वहीं पायल अब्दुल्ला भी इस पूरे मामले में अदालत की प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखती रहीं।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बताता है कि यदि लंबे समय से अलग रह रहे दंपति आपसी सहमति से विवाह समाप्त करना चाहते हैं और सभी विवाद सुलझा लेते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट विशेष परिस्थितियों में अनुच्छेद 142 के तहत राहत दे सकता है। हालांकि हर मामला अपने तथ्यों के आधार पर तय होता है और इस फैसले को सभी मामलों पर समान रूप से लागू नहीं माना जा सकता।
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