
‘Apang Opang Jhapang’ Row: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर नया विवाद सामने आया है। बताया जा रहा है राज्य की नई सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की किताबों को लेकर बड़ा फैसला लिया है। राज्य के पुस्तकालय मंत्री Gaurishankar Ghosh ने घोषणा की है कि सरकारी सहायता प्राप्त पुस्तकालयों से ‘एपांग ओपांग झपांग’ जैसी पुस्तकों को हटाया जाएगा। इस फैसले के बाद राज्य में साहित्य और राजनीति को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। ऐसे में आइए यहां विस्तार से जानते हैं पूरा मामला
क्या है ‘एपांग ओपांग झपांग’?
आपकी जानकारी के लिए बता दें ‘एपांग ओपांग झपांग’ कोई पारंपरिक साहित्यिक शब्द नहीं है। यह मूल रूप से बच्चों के लिए बनाए गए एक एनर्जी ड्रिंक के विज्ञापन का जिंगल माना जाता है। इन शब्दों का बंगाली भाषा में कोई स्पष्ट अर्थ नहीं बताया जाता है। बाद में ममता बनर्जी ने अपनी एक कविता में इन शब्दों का प्रयोग किया, जिसके बाद यह काफी चर्चा में आ गया।
राजनीतिक विरोधियों ने इसे लेकर कई बार ममता बनर्जी पर निशाना साधा है। जिसमें खासकर भाजपा नेताओं ने इस कविता को लेकर सवाल उठाए और इसे अर्थहीन कविता बताया। वहीं तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों का कहना है कि यह एक रचनात्मक अभिव्यक्ति है, जिसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
पुस्तकालय मंत्री ने क्यों उठाया यह कदम?
पुस्तकालय मंत्री गौरीशंकर घोष का कहना है कि पुस्तकालय ज्ञान और शिक्षा का केंद्र होते हैं। उनका कहना है की वहां ऐसी किताबें रखी जानी चाहिए जो छात्रों और पाठकों के बौद्धिक विकास में मदद करें। उन्होंने कहा कि पुस्तकालयों में सीमित जगह होती है और उसका उपयोग उन पुस्तकों के लिए किया जाना चाहिए जो बच्चों में राष्ट्रीय चेतना, नैतिक मूल्यों और ज्ञान का विस्तार करें। मंत्री का मानना है कि ‘एपांग ओपांग झपांग’ जैसी कविताएं पाठकों के व्यक्तित्व निर्माण में विशेष योगदान नहीं देतीं।
ऐसे में उनके इस बयान के बाद राज्य में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या सरकार को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि कौन-सी किताब पुस्तकालय में रहे और कौन-सी नहीं।
ममता बनर्जी की किताबों पर सीधा निशाना
एक इंटरव्यू के दौरान जब मंत्री से पूछा गया कि क्या ममता बनर्जी की लिखी किताबें भी पुस्तकालयों से हटाई जाएंगी, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसी पुस्तकों को रखने का कोई औचित्य नहीं है जो बच्चों के मानसिक विकास में सहायक न हों। उन्होंने कहा कि पुस्तकालयों में महान साहित्यकारों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की किताबों को प्राथमिकता दी जाएगी। मंत्री के अनुसार भविष्य में लाइब्रेरी में ऐसे साहित्य को बढ़ावा दिया जाएगा जो विद्यार्थियों को प्रेरणा और ज्ञान प्रदान करे।
किन किताबों को मिलेगी प्राथमिकता?
नई सरकार का कहना है कि पुस्तकालयों में अब ऐसे लेखकों और विचारकों की किताबों को अधिक महत्व दिया जाएगा जिनका भारतीय समाज और संस्कृति पर गहरा प्रभाव रहा है।
सरकार के अनुसार पुस्तकालयों में निम्न प्रकार के साहित्य को बढ़ावा दिया जाएगा—
- रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाएं
- काजी नजरुल इस्लाम का साहित्य
- स्वामी विवेकानंद के विचार
- छत्रपति शिवाजी महाराज की जीवनी
- महाराणा प्रताप से जुड़ी पुस्तकें
- भारतीय इतिहास और संस्कृति पर आधारित साहित्य
‘कविता बितान’ को लेकर भी हुआ था विवाद
बता दें की यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी की साहित्यिक रचनाएं चर्चा में आई हैं। वर्ष 2022 में उन्हें उनके काव्य संग्रह ‘कविता बितान’ के लिए बंगला अकादमी पुरस्कार मिला था। उस समय भी साहित्यिक जगत और राजनीतिक दलों के बीच बहस छिड़ गई थी। आलोचकों ने पुरस्कार को लेकर सवाल उठाए थे, जबकि समर्थकों ने इसे एक साहित्यकार के रूप में ममता बनर्जी की उपलब्धि बताया था।
‘एपांग ओपांग झपांग’ वाली कविता भी उसी दौर में काफी चर्चा का विषय बनी थी और आज भी राजनीतिक विवाद का कारण बनी हुई है।
स्कूल लाइब्रेरी में शामिल की गई थीं ममता की किताबें
दरअसल जून 2025 में तत्कालीन सरकार ने स्कूल पुस्तकालयों में ममता बनर्जी द्वारा लिखी गई पुस्तकों को शामिल करने का फैसला किया था। उस समय जारी सूची में कुल 515 पुस्तकों को जगह दी गई थी। इनमें लगभग 90 किताबें ममता बनर्जी की लिखी हुई थीं। स्कूलों को इन पुस्तकों की खरीद के लिए आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई थी। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के लिए विशेष बजट जारी किया गया था और प्रत्येक स्कूल को करीब 1 लाख रुपये तक की राशि उपलब्ध कराई गई थी। उस समय विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि सरकारी संसाधनों का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिए किया जा रहा है। हालांकि तत्कालीन सरकार ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था।
नई सरकार बदल रही है पुरानी नीतियां
राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार लगातार पिछली सरकार के कई फैसलों की समीक्षा कर रही है। ‘एपांग ओपांग झपांग’ विवाद भी इसी क्रम का हिस्सा माना जा रहा है।
सरकार का कहना है कि पुस्तकालयों में केवल ऐसी किताबें रखी जाएंगी जो शिक्षा, ज्ञान और राष्ट्र निर्माण के दृष्टिकोण से उपयोगी हों। वहीं विपक्ष का आरोप है कि यह साहित्यिक स्वतंत्रता पर हमला है और राजनीतिक कारणों से पूर्व मुख्यमंत्री को निशाना बनाया जा रहा है।
राजनीतिक और साहित्यिक बहस हुई तेज
इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल में राजनीतिक माहौल फिर गरमा गया है। भाजपा इसे शिक्षा और पुस्तकालय व्यवस्था में सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि सरकार साहित्य को राजनीतिक चश्मे से देख रही है।
साहित्यकारों और शिक्षाविदों के बीच भी इस विषय पर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। कुछ लोग पुस्तकालयों में गुणवत्ता आधारित चयन का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि किसी लेखक की किताब को राजनीतिक आधार पर हटाना उचित नहीं है।
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