
US Iran War Update: मिडिल ईस्ट में एक बार फिर से तनाव खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। जिसमें अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल युद्धविराम लागू है, लेकिन दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी अब खुलकर सामने आने लगी है। अब इसी बीच अमेरिका ने ईरान के सामने 5 बड़ी शर्तें रख दी हैं, जिनसे पूरे इलाके में नई हलचल मच गई है। सबसे ज्यादा चर्चा उस मांग की हो रही है, जिसमें अमेरिका ने ईरान से 400 किलो एनरिच्ड यूरेनियम सौंपने को कहा है।
ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei इन शर्तों को मानेंगे या फिर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और बढ़ जाएगा। आइए जानते यहां पूरी खबर
अमेरिका ने रखीं 5 कड़ी शर्तें
ईरानी के खबरों के मुताबिक, अमेरिका ने बातचीत के दौरान ईरान के सामने कई सख्त शर्तें रखी हैं। जिसमें इन शर्तों का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी क्षेत्रीय ताकत को सीमित करना बताया जा रहा है।
मुआवजा देने से इनकार: अमेरिका ने साफ कर दिया है कि प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाइयों की वजह से ईरान को जो आर्थिक नुकसान हुआ है, उसके लिए कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा। ईरान लंबे समय से अरबों डॉलर के नुकसान की भरपाई की मांग करता रहा है, लेकिन वॉशिंगटन ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया।
400 किलो यूरेनियम सौंपने की मांग: बता दें की सबसे बड़ी और संवेदनशील शर्त यह मानी जा रही है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने पास मौजूद 400 किलोग्राम एनरिच्ड यूरेनियम अंतरराष्ट्रीय निगरानी में सौंप दे। अमेरिका का कहना है कि यह कदम परमाणु हथियारों की आशंका को कम करेगा।
परमाणु सुविधाओं पर सख्ती: अमेरिका ने कहा है कि ईरान केवल एक परमाणु सुविधा को सीमित स्तर पर चालू रख सकता है। बाकी सभी परमाणु केंद्रों को बंद करना होगा। यह मांग ईरान के लिए बेहद मुश्किल मानी जा रही है क्योंकि तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखता है।
फ्रीज संपत्तियों पर रोक: विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियों का 25 फीसदी हिस्सा जारी करने की मांग को भी अमेरिका ने ठुकरा दिया है। ईरान लंबे समय से अपने फ्रीज किए गए फंड को वापस पाने की कोशिश कर रहा है।
क्षेत्रीय संघर्ष बातचीत से खत्म हों: अमेरिका चाहता है कि लेबनान, सीरिया और अन्य मोर्चों पर ईरान समर्थित समूह हथियारों के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाएं। इसके जरिए अमेरिका मिडिल ईस्ट में ईरान के प्रभाव को सीमित करना चाहता है।
ईरान ने भी रखीं अपनी 10 मांगें
अमेरिका की शर्तों के जवाब में ईरान ने भी अपनी कई मांगें सामने रखी हैं। जिसमें तेहरान का कहना है कि बिना ठोस गारंटी के वह किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा। जिसमें ईरान की प्रमुख मांगों में सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाना, रोकी गई संपत्तियों को पूरी तरह बहाल करना और युद्ध के दौरान हुए नुकसान का मुआवजा शामिल है। इसके अलावा ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज स्ट्रेट पर अपने अधिकार को भी मान्यता देने की मांग की है। ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि दोनों देशों की मांगें इतनी कठोर हैं कि समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा।
युद्धविराम के बावजूद क्यों बढ़ रहा तनाव?
दरअसल 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ गया था। इसके बाद 7 अप्रैल को युद्धविराम लागू किया गया। हालांकि युद्धविराम के बाद भी दोनों देशों के बीच बयानबाजी और रणनीतिक दबाव जारी है। जिससे अमेरिका को डर है कि ईरान तेजी से परमाणु क्षमता बढ़ा रहा है, जबकि ईरान का आरोप है कि अमेरिका उसकी संप्रभुता और सुरक्षा को कमजोर करना चाहता है। यही वजह है कि बातचीत आगे बढ़ने के बजाय और उलझती दिख रही है।
पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल
इस पूरे विवाद में Pakistan की भूमिका भी चर्चा में आ गई है। पाकिस्तान खुद को दोनों देशों के बीच मध्यस्थ बताता रहा है, लेकिन अब उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। जिसमें कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि जब पाकिस्तान अमेरिका के साथ शांति वार्ता में शामिल था, उसी दौरान ईरानी सैन्य विमान पाकिस्तानी जमीन पर उतर रहे थे। आरोप यह भी है कि पाकिस्तान ने इन विमानों को अमेरिकी निगरानी से बचाने में मदद की। अब अगर ये दावे सही साबित होते हैं तो अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। इससे मिडिल ईस्ट की कूटनीति पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।
क्या करेंगे खामेनेई?
अब सबसे बड़ी नजर ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei पर टिकी हुई है। ईरान के अंदर कट्टरपंथी गुट अमेरिका के सामने झुकने के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि अगर ईरान ने यूरेनियम सौंप दिया या परमाणु कार्यक्रम सीमित किया तो उसकी रणनीतिक ताकत कमजोर पड़ जाएगी। वहीं दूसरी तरफ ईरान की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है। लंबे प्रतिबंधों की वजह से महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसे में कुछ वर्ग मानते हैं कि बातचीत के जरिए समाधान निकालना जरूरी है।
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि खामेनेई फिलहाल सीधे टकराव से बचने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन वे अमेरिका की सभी शर्तें आसानी से नहीं मानेंगे।
मिडिल ईस्ट पर क्या होगा असर?
ऐसे में अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। खासतौर पर कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है और यहां किसी भी सैन्य तनाव का असर वैश्विक बाजार पर पड़ता है। इसके अलावा लेबनान, सीरिया, इराक और यमन जैसे देशों में भी संघर्ष तेज हो सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
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