
TMC Symbol Dispute: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को हर दिन नई-नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, इन दिनों ममता बनर्जी पर एक नया राजनीतिक संकट गहरा रहा है। बताया जा रहा है कि पार्टी के गठन के 28 साल बाद पहली बार ऐसी स्थिति बनी है, जब दो अलग-अलग गुट खुद को ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ (Real Trinamool Congress) बता रहे हैं। अब इस विवाद पर चुनाव आयोग की नजर है और सोमवार यानी 6 जुलाई, 2026 के दिन दोनों पक्ष अपने-अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज और सबूत पेश करेंगे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह मामला सिर्फ पार्टी के नाम या चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन, संपत्ति, पार्टी फंड और कोलकाता स्थित मुख्यालय ‘तृणमूल भवन’ (Trinamool Bhavan) पर नियंत्रण की लड़ाई भी बन चुका है।
चुनाव आयोग ने मांगे दोनों पक्षों से सबूत
चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी गुट और बागी गुट दोनों को सोमवार शाम 5:30 बजे तक अपने दावों के समर्थन में जरूरी दस्तावेज जमा करने के निर्देश दिए हैं। पिछले सप्ताह आयोग ने दोनों पक्षों की शुरुआती दलीलें सुनी थीं। अब आयोग संगठनात्मक रिकॉर्ड, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के समर्थन और कानूनी आधार पर यह तय करेगा कि असली तृणमूल कांग्रेस (Real Trinamool Congress) किसे माना जाए। ऐसे में आयोग का फैसला पार्टी के भविष्य के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
ममता बनर्जी का दावा है कि संगठन और कार्यकर्ता हमारे साथ
वहीं, ममता बनर्जी की तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना (Founding of the Trinamool Congress) से लेकर आज तक संगठन का निर्माण उन्हीं के नेतृत्व में हुआ है। उनका कहना है कि पार्टी का मूल ढांचा, कार्यकर्ता और संगठनात्मक व्यवस्था अब भी उनके साथ है। इसके अलावा, ममता समर्थकों का मानना है कि पार्टी की पहचान केवल विधायकों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके संविधान, संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं से तय होती है।
बागी गुट ने भी दावा किया है कि बहुमत हमारे साथ
देखा जाए तो दूसरी ओर बागी गुट का भी कहना है कि उसके पास पार्टी के अधिकांश विधायक और कई सांसदों का समर्थन है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बागी गुट ने दावा किया है कि 80 में से करीब 65 विधायक और 21 लोकसभा सांसद उनके साथ हैं। बागी नेताओं का कहना है कि जब निर्वाचित प्रतिनिधियों का बहुमत उनके पक्ष में है, तो पार्टी पर उनका अधिकार बनता है। इसी आधार पर उन्होंने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताया है।
मुख्यालय पर कब्जे को लेकर भी बढ़ा विवाद
राजनीतिक लड़ाई अब संगठन से आगे बढ़कर पार्टी मुख्यालय तक पहुंच गई है। बागी गुट ने हाल ही में कोलकाता स्थित ‘तृणमूल भवन’ (Trinamool Bhavan) पर कब्जा करने का दावा किया। इस दौरान भवन के ताले बदले गए और नए पोस्टर भी लगाए गए, लेकिन बाद में भवन के मालिक द्वारा ताला खुलवाए जाने की भी खबर सामने आई। इसके बावजूद मुख्यालय पर नियंत्रण को लेकर दोनों गुटों के बीच विवाद लगातार बना हुआ है।
ममता की हार के बाद शुरू हुआ था विवाद
मिली जानकारी के मुताबिक, विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ने लगा था। शुरुआत में यह विवाद कुछ विधायकों की नाराजगी तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे यह संगठनात्मक बगावत में बदल गया। पिछले महीने बागी गुट ने अलग बैठक बुलाकर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष घोषित कर दिया था और साथ ही समानांतर नेतृत्व की घोषणा भी कर दी गई थी। इसके बाद पार्टी में टकराव पहले से भी काफी अधिक तेज हो गई।
ममता बनर्जी बोलीं- चुनाव चिह्न नहीं छिनेगा
इन सभी मामलों के बीच ममता बनर्जी ने बागी नेताओं के दावों को खारिज किया है और साथ ही कहा है कि चुनाव आयोग पार्टी का चुनाव चिह्न (Party’s Election Symbol) उनसे नहीं छीनेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें चुनाव चिह्न को लेकर कोई चिंता नहीं है। उनका कहना था कि अगर ऐसी स्थिति भी आई तो वह चुनाव चिह्न को गले में लटकाकर जनता के बीच जाएंगी। साथ ही उन्होंने बागी नेताओं पर राजनीतिक साजिश और विश्वासघात का आरोप भी लगाया।
क्या पार्टी का चुनाव चिह्न बदल सकता है?
अगर चुनाव आयोग (Election Commission) यह तय नहीं कर पाते हैं कि असली तृणमूल कांग्रेस (Real Trinamool Congress) कौन है, तो वह पार्टी के चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को नए नाम और नए चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ना पड़ सकता है। आयोग किसी एक गुट को संगठन और बहुमत के आधार पर असली पार्टी मान लेता है, तो उसी गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न मिल सकता है।
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