
Egg Attack On TMC: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक नए शब्द ‘डिंबक्रेसी’ को लेकर चर्चा में है। बताया जा रहा है की बंगाली भाषा में अंडे को ‘डिंब’ कहा जाता है और अब विरोध की राजनीति में यही अंडा सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है। जिससे राज्य में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई नेताओं पर अंडे फेंके जाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। अब यही वजह है कि सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक लोग कहने लगे हैं कि बंगाल में अब “डेमोक्रेसी नहीं, डिंबक्रेसी चल रही है।”
चुनाव बाद बढ़ा विरोध का नया तरीका
जानकारी के लिए बता दें की पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद जब टीएमसी (TMC) नेता जनता के बीच पहुंचे तो कई जगहों पर उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों ने “चोर-चोर” के नारे लगाए और नेताओं पर अंडे फेंके। यह विरोध अब एक ट्रेंड का रूप ले चुका है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि पहले जहां विरोध प्रदर्शन नारेबाजी और धरनों तक सीमित रहता था, वहीं अब अंडा फेंकना राजनीतिक नाराजगी का नया प्रतीक बन गया है। यह ऐसा तरीका है जो कैमरे में आसानी से कैद होता है और कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंच जाता है।
अभिषेक बनर्जी पर हुआ पहला बड़ा अंडा अटैक
दरअसल 4 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में पहली बार टीएमसी के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी को विरोध का सामना करना पड़ा। वहां मौजूद कुछ लोगों ने उनके खिलाफ नारेबाजी की और अंडे फेंके। इस दौरान जूते और पत्थर फेंकने की भी खबरें सामने आईं। बाद में कई कार्यक्रमों में अभिषेक बनर्जी अंडों से बचने के लिए छाते की ओट लेते दिखाई दिए।
कुणाल घोष से लेकर मदन मित्रा तक निशाने पर
अभिषेक बनर्जी के बाद यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष जब ममता बनर्जी के घर के बाहर मीडिया से बात कर रहे थे, तभी एक युवक ने उन पर अंडा फेंक दिया, जो सीधे उनके सिर पर लगा।
इसी तरह पश्चिम बर्धमान के रानीगंज में टीएमसी नेता सौमित्र बनर्जी पर भी अंडा फेंका गया। वहीं 7 जून को टीएमसी के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा अपनी विधानसभा कमारहाटी में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे, जहां भीड़ ने उन पर अंडों की बौछार कर दी। हालात ऐसे बन गए कि उन्हें कार्यक्रम बीच में छोड़कर वापस लौटना पड़ा।
बीजेपी बोली- यह जनता का प्रतिवाद
बीजेपी नेता अग्निमित्रा पॉल ने इस पूरे घटनाक्रम को जनता का गुस्सा बताया। उन्होंने कहा, “भारत में डेमोक्रेसी है लेकिन बंगाल में डिंबक्रेसी है। अब अंडे की दुकान पर भी पूछा जाता है कि खाने वाला अंडा चाहिए या मारने वाला। मारने वाले अंडे की कीमत ज्यादा है।” उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी ने पिछले 15 वर्षों में जो राजनीति की, उसी के खिलाफ जनता अब इस तरह से विरोध जता रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि यह किसी पार्टी की साजिश नहीं बल्कि लोगों की नाराजगी का प्रतीक है।
टीएमसी ने कहा- यह लोकतंत्र पर हमला
दूसरी ओर टीएमसी ने इन घटनाओं को राजनीतिक हिंसा करार दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सौगत रॉय ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर इन घटनाओं पर रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि लगातार शिकायतों के बावजूद दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जा रही है।
वहीं टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि यदि कोई उन पर अंडा या टमाटर फेंकता है तो वीडियो फुटेज के जरिए उसकी पहचान कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी और जरूरत पड़ी तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा।
आखिर अंडे ही क्यों बने विरोध का प्रतीक?
राजनीतिक विरोध में अंडे के इस्तेमाल के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। पहला, इससे किसी को गंभीर चोट लगने की संभावना कम होती है लेकिन सार्वजनिक रूप से व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचता है। दूसरा, सड़े हुए अंडे की बदबू और गंदगी विरोध को और ज्यादा प्रतीकात्मक बना देती है।
कानूनी रूप से भी अंडा फेंकने को गंभीर हिंसक अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाता। यही वजह है कि विरोध करने वाले लोग इसे एक अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला तरीका मानते हैं।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई ‘डिंबक्रेसी’ की लोकप्रियता
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सोशल मीडिया के दौर में ऐसे विरोध तेजी से लोकप्रिय होते हैं। अंडा फेंकने की एक छोटी सी घटना भी वीडियो बनकर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। इससे विरोध करने वालों को व्यापक प्रचार मिलता है और राजनीतिक संदेश तेजी से फैलता है।
क्या बंगाल की राजनीति में नया अध्याय है ‘डिंबक्रेसी’?
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से प्रतीकों की राजनीति रही है। कभी दीवारों पर लिखे नारे सत्ता का रुख तय करते थे, कभी जुलूस और धरने राजनीतिक माहौल बनाते थे। अब अंडा भी उसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। हालांकि सवाल यह है कि क्या विरोध का यह तरीका लोकतांत्रिक असहमति का नया रूप है या फिर राजनीतिक संवाद के स्तर में गिरावट का संकेत? इसका जवाब आने वाले समय में बंगाल की राजनीति ही तय करेगी। फिलहाल इतना जरूर है कि राज्य में ‘डिंबक्रेसी’ शब्द तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और अंडा अब सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का नया प्रतीक बन चुका है।
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