
Electric Vehicles: ईरान में जारी तनाव और युद्ध के कारण वैश्विक तेल बाजार में बड़ा असर देखने को मिल रहा है। जिसमें कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेजी आई है।वहीं, इसका सीधा असर यूरोप के देशों पर पड़ा है, जहां ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद लोगों का रुझान तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर बढ़ रहा है। खासतौर पर सेकंड हैंड यानी इस्तेमाल की हुई इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग में अचानक उछाल देखने को मिल रहा है। उपभोक्ता अब सस्ती और कम खर्च वाली गाड़ियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पेट्रोल की कीमतों में कितना हुआ इजाफा?
यूरोपीय आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी के अंत से लेकर मार्च के मध्य तक पेट्रोल की कीमतों में करीब 12 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी आम लोगों के बजट पर सीधा असर डाल रही है। ईंधन की लागत बढ़ने से रोजाना यात्रा करने वाले लोग ज्यादा परेशान हैं। ऐसे में वे ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जिनमें खर्च कम हो और लंबी अवधि में फायदा मिले।
कार खरीदने का ट्रेंड तेजी से बदल रहा
दरअसल यूरोप में अब कार खरीदने का ट्रेंड बदलता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। जहां पहले पेट्रोल और डीजल गाड़ियों की मांग ज्यादा होती थी, वहीं अब इलेक्ट्रिक वाहनों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। जिसमें कुछ प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं।
- नॉर्वे में इलेक्ट्रिक गाड़ियां अब डीजल वाहनों से ज्यादा बिक रही हैं।
- फ्रांस में ईवी की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।
- पेट्रोल और डीजल गाड़ियों की मांग में गिरावट दर्ज की जा रही है।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी बढ़ी गतिविधि
जानकारी के लिए बता दें ऑनलाइन कार खरीद-बिक्री प्लेटफॉर्म्स पर भी इस बदलाव का असर साफ नजर आ रहा है।
- इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़ी सर्च में बढ़ोतरी।
- इंक्वायरी (पूछताछ) में तेजी।
- ऑर्डर बुकिंग में लगातार उछाल।
सेकंड हैंड ईवी क्यों बन रहे पहली पसंद?
नई इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तुलना में सेकंड हैंड ईवी की मांग ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इसके पीछे कई अहम कारण हैं।
कम कीमत
यूज्ड ईवी नई गाड़ियों के मुकाबले लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक सस्ती मिलती हैं। इससे आम ग्राहक भी आसानी से इन्हें खरीद सकता है।
तुरंत उपलब्धता
नई इलेक्ट्रिक कारों के लिए कई बार लंबा इंतजार करना पड़ता है, जबकि सेकंड हैंड गाड़ियां तुरंत मिल जाती हैं।
कम रनिंग कॉस्ट
इलेक्ट्रिक वाहन चलाने का खर्च पेट्रोल और डीजल के मुकाबले काफी कम होता है। इससे लंबी अवधि में अच्छी बचत होती है।
मेंटेनेंस कम
ईवी में पारंपरिक इंजन नहीं होता, जिससे इसकी मेंटेनेंस लागत भी कम होती है।
अन्य यूरोपीय देशों में भी दिख रहा असर
यह ट्रेंड सिर्फ कुछ देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे यूरोप में फैल रहा है।
- स्वीडन: ईवी की बिक्री और ऑनलाइन व्यूज में बढ़ोतरी।
- जर्मनी: इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सर्च और डीलर इंक्वायरी में तेजी।
- डेनमार्क: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ईवी सर्च में उछाल।
क्या पहले भी ऐसा ट्रेंड देखा गया था?
बता दें कि ऐसा ट्रेंड पहले भी देखने को मिला है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी ऊर्जा संकट के चलते पेट्रोल और गैस की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई थी। उस समय भी इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग में तेजी आई थी।इससे यह स्पष्ट होता है कि जब भी ईंधन महंगा होता है, लोग तेजी से वैकल्पिक साधनों की ओर बढ़ते हैं।
कंपनियां भी उठा रही हैं फायदा
इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली कंपनियां भी इस मौके का पूरा फायदा उठा रही हैं। वे अपने विज्ञापनों और मार्केटिंग में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को दिखाकर ग्राहकों को ईवी की ओर आकर्षित कर रही हैं। जिसमें कई कंपनियां अब “कम खर्च, ज्यादा बचत” जैसे संदेशों के साथ अपने उत्पादों को प्रमोट कर रही हैं।
भविष्य में और बढ़ सकता है यह ट्रेंड
एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाले समय में यह ट्रेंड और तेजी पकड़ सकता है। इसके पीछे कई कारण हैं।
- लगातार बढ़ती ईंधन कीमतें
- पर्यावरण के प्रति जागरूकता
- सरकारों द्वारा ईवी को बढ़ावा
- चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार






