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West Bengal Politics: ममता बनर्जी की पार्टी में बगावत तेज, ऋतब्रत बनर्जी को नया नेता प्रतिपक्ष बनाने की तैयारी
Current image: ऋतब्रत बनर्जी

 West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा सियासी भूचाल आता दिखाई दे रहा है। 2026 विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता से बाहर हुई तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं। ताजा घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के भीतर गुटबाजी को उजागर किया है, बल्कि संभावित टूट की अटकलों को भी हवा दे दी है।

निष्कासित विधायक Ritabrata Banerjee और Sandipan Saha खुलकर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक खड़े हैं और वे विधानसभा में नए नेता प्रतिपक्ष के रूप में दावा पेश करने की तैयारी कर रहे हैं।

TMC के भीतर क्यों गहराया संकट?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से खराब प्रदर्शन के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही थीं। पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठ रहे थे और संगठनात्मक फैसलों को लेकर भी नाराजगी देखी जा रही थी। हालात तब और बिगड़ गए जब पार्टी ने 1 जून को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को कथित “पार्टी विरोधी गतिविधियों” के आरोप में निष्कासित कर दिया। पार्टी का आरोप था कि दोनों विधायक नेतृत्व के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे थे और संगठन के हितों के खिलाफ काम कर रहे थे। हालांकि दोनों नेताओं का कहना है कि उन्होंने केवल पार्टी के भीतर उठ रहे गंभीर मुद्दों को सामने रखा था और इसी कारण उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।

‘फेक सिग्नेचर’ विवाद बना बगावत की वजह

इस पूरे विवाद की जड़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और मुख्य सचेतक से जुड़े एक कथित ‘फेक सिग्नेचर’ मामले को माना जा रहा है। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा सचिवालय में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया था कि कुछ आधिकारिक दस्तावेजों में उनके हस्ताक्षर बिना अनुमति के इस्तेमाल किए गए। इस विवाद ने पार्टी के भीतर पहले से मौजूद असंतोष को और बढ़ा दिया। जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, पार्टी नेतृत्व ने दोनों नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया। लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया।

59 विधायकों के समर्थन का दावा

बुधवार को ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा पहुंचे और उन्होंने दावा किया कि उनके साथ लगभग 59 विधायक हैं। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को कथित तौर पर एक पत्र भी सौंपा, जिसमें कई विधायकों के समर्थन का उल्लेख किया गया। यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह TMC के लिए बेहद गंभीर स्थिति होगी। पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायक हैं। ऐसे में 59 विधायकों का समर्थन किसी भी गुट को निर्णायक ताकत दे सकता है। हालांकि इन विधायकों की पूरी सूची आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई है और पार्टी नेतृत्व ने भी इन दावों को लेकर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है।

नेता प्रतिपक्ष पद पर दावा

बागी गुट अब केवल असंतोष जताने तक सीमित नहीं दिख रहा। सूत्रों के अनुसार ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। बताया जा रहा है कि बागी खेमे ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष अपने समर्थन का दावा पेश किया है और विधानसभा में अलग पहचान बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति में ‘शिंदे मॉडल’ जैसी चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में हुई शिवसेना की टूट से कर रहे हैं, जहां बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन के आधार पर सत्ता समीकरण बदल गए थे।

ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह संकट केवल दो विधायकों के निष्कासन का मामला नहीं है। यह पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और भविष्य की दिशा को लेकर चल रहे व्यापक असंतोष का संकेत हो सकता है। चुनावी हार के बाद TMC पहले ही दबाव में थी। अब यदि पार्टी के भीतर बड़े पैमाने पर असंतोष सामने आता है तो यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक साबित हो सकता है।

पार्टी संगठन में बड़े बदलाव

इस बीच तृणमूल कांग्रेस ने राज्यभर में अपने संगठनात्मक ढांचे को भंग करने और पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा की जाएगी और संगठन को नए सिरे से खड़ा किया जाएगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह कदम पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी को नियंत्रित करने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए उठाया गया है।

अभिषेक बनर्जी पर भी उठे सवाल

बागी नेताओं ने पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं और रणनीतिक फैसलों पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार संगठन के भीतर चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और नेतृत्व शैली को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने इन आरोपों को खारिज किया है और दावा किया है कि संगठन एकजुट है।

ममता बनर्जी का जवाब

हाल के दिनों में ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि विपक्षी ताकतें और राजनीतिक विरोधी उनकी पार्टी को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि धनबल और दबाव की राजनीति के जरिए TMC को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। ममता ने बागी नेताओं पर अप्रत्यक्ष निशाना साधते हुए उन्हें “मीर जाफर” जैसी उपमा भी दी, जो बंगाल के राजनीतिक इतिहास में विश्वासघात के प्रतीक के रूप में देखी जाती है।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बागी गुट वास्तव में उतनी ताकत रखता है जितना दावा किया जा रहा है। यदि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष पर्याप्त संख्या में विधायक समर्थन का दावा करते हैं, तो राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। दूसरी ओर, यदि पार्टी नेतृत्व विधायकों को वापस अपने साथ जोड़ने में सफल हो जाता है, तो यह संकट टल भी सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन बंगाल की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

विपक्ष को मिल सकता है फायदा

TMC के भीतर जारी इस संघर्ष का सबसे बड़ा लाभ विपक्षी दलों को मिल सकता है। यदि पार्टी में टूट की स्थिति बनती है तो विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। विशेष रूप से भाजपा और वाम दल इस घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि TMC कमजोर होती है तो राज्य की विपक्षी राजनीति को नई ऊर्जा मिल सकती है।

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Author

  • Sakshi Raj

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