
Shiv Sena Split: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला है। बताया जा रहा है की शिवसेना (UBT) के छह सांसदों ने पार्टी से बगावत करते हुए उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है। इस घटनाक्रम को उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही थीं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें की शिंदे गुट में शामिल होने वाले सांसदों में संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, पाटिल-अष्टिकर और ओमप्रकाश राजेनिंबालकर शामिल हैं। इन सभी सांसदों ने दिल्ली में 17 जून को आयोजित शिवसेना (यूबीटी) की संसदीय दल की बैठक में हिस्सा नहीं लिया था। तभी से उनके पार्टी छोड़ने की अटकलें तेज हो गई थीं।
शिंदे बोले- अब मेरे पास तीन संजय हैं
बता दें छह सांसदों के शामिल होने के बाद एकनाथ शिंदे ने कहा कि यह सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि विचारधारा की जीत है। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, “अब मेरे पास तीन संजय हैं।” इसके साथ ही उन्होंने 2022 में हुई बगावत को याद करते हुए कहा कि उस समय 40 विधायकों ने उनका साथ दिया था और आज उनकी पार्टी पहले से ज्यादा मजबूत हो चुकी है।
शिंदे ने कहा कि उन्होंने हमेशा बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा को बचाने के लिए संघर्ष किया है। उनका कहना है यह बगावत का दूसरा चरण है और जो सांसद आज उनके साथ आए हैं, वे असली शिवसेना के परिवार का हिस्सा बन गए हैं।
‘हमने इस बार सिक्सर मारा’
एकनाथ शिंदे ने अपने संबोधन में कहा कि उनकी पार्टी लगातार मजबूत हो रही है। उन्होंने कहा, “हमने इस बार सिक्सर मारा है। हम किसी का रास्ता नहीं रोकते, लेकिन अगर कोई हमारा रास्ता रोकने की कोशिश करता है तो उसका जवाब देना हमें बालासाहेब ठाकरे ने सिखाया है।” उन्होंने दावा किया कि जब उन्होंने बगावत की थी, तब उनके साथ 40 विधायक थे, लेकिन बाद में चुनाव में उनकी पार्टी को और ज्यादा समर्थन मिला। पिछले दो वर्षों में शिवसेना ने अपने संगठन को मजबूत किया है और जनता के बीच अपनी पकड़ बढ़ाई है।
विचारधारा से समझौता नहीं
शिंदे ने कहा कि उनकी पार्टी हिंदुत्व की विचारधारा पर मजबूती से कायम है। उन्होंने बिना नाम लिए विपक्षी नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ लोगों ने अपनी विचारधारा छोड़ दी और जनता के भरोसे को तोड़ा है। साथ ही, उन्होंने भरोसा दिलाया कि उनकी पार्टी में शामिल हुए सभी सांसदों के क्षेत्रों में विकास कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी में कोई बड़ा या छोटा नहीं है, बल्कि सभी कार्यकर्ता और नेता एक परिवार की तरह काम करते हैं।
उद्धव गुट को क्यों लगा झटका?
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि छह सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना शिवसेना (यूबीटी) के लिए बड़ा नुकसान है। इससे पहले भी 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में कई विधायकों ने बगावत कर उद्धव ठाकरे से अलग रास्ता अपनाया था। उसी बगावत के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और राज्य में नई सरकार का गठन हुआ।
अब सांसदों के इस फैसले ने यह संकेत दिया है कि शिवसेना की सियासी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उद्धव ठाकरे इस चुनौती का सामना किस तरह करते हैं।
सांसदों ने क्या कहा?
शिवसेना में शामिल हुए सांसद ओमप्रकाश राजेनिंबालकर ने अपने फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि राजनीति में विकास सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि लोग सत्ता की ओर आकर्षित हो रहे हैं तो यह केवल राजनीतिक ट्रेंड नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी कदम है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी सांसदों को विकास कार्यों के लिए पर्याप्त फंड नहीं मिल रहा है। ऐसे में जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सत्ता पक्ष के साथ काम करना जरूरी हो जाता है।
मुरजी पटेल का उद्धव गुट पर हमला
विधायक मुरजी पटेल ने भी उद्धव ठाकरे की पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि शिवसेना (यूबीटी) अपने सांसदों को एकजुट रखने में नाकाम रही है। पार्टी के भीतर असंतोष लंबे समय से था, जिसका परिणाम अब सामने आ गया है। उन्होंने दावा किया कि आने वाले दिनों में शिवसेना (यूबीटी) को और भी राजनीतिक झटके लग सकते हैं, क्योंकि कई नेता और कार्यकर्ता शिंदे गुट की नीतियों से प्रभावित हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या होगा असर?
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि छह सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने से महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन बदल सकता है। इससे एकनाथ शिंदे की राजनीतिक ताकत और बढ़ेगी, जबकि उद्धव ठाकरे के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती और कठिन हो जाएगी।
अब आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों और भविष्य के विधानसभा चुनावों पर भी इस घटनाक्रम का असर पड़ सकता है। फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है।
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