
Karanataka Congress: कर्नाटक की राजनीति में उस समय बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला, जब राज्य के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बताया जा रहा है कि उन्हें उनकी पसंद का विभाग नहीं मिलने से नाराजगी थी, जिसके बाद उन्होंने यह बड़ा फैसला लिया। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली है और अपनी नई मंत्रिपरिषद के विभागों का बंटवारा किया है। विभागों के आवंटन के महज एक दिन बाद ही एक मंत्री का इस्तीफा सामने आना कांग्रेस सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
विभागों के बंटवारे के बाद शुरू हुआ विवाद
गुरुवार रात मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपनी 13 सदस्यीय मंत्रिपरिषद के बीच विभागों का वितरण किया था। मुख्यमंत्री ने वित्त, कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग (DPAR), मंत्रिमंडल मामलों, खुफिया विभाग और अन्य कुछ महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रखे। वहीं रामलिंगा रेड्डी को जल संसाधन (प्रमुख एवं मध्यम सिंचाई) विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सूत्रों के अनुसार विभागों के इस बंटवारे से रेड्डी संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने अपनी नाराजगी भी जताई थी।
‘बेंगलुरु शहरी विकास’ विभाग चाहते थे रेड्डी
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो रामलिंगा रेड्डी लंबे समय से ‘बेंगलुरु शहरी विकास’ विभाग की मांग कर रहे थे। यह विभाग राज्य की राजधानी बेंगलुरु के विकास, बुनियादी ढांचे और शहरी परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है, जिसे काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन मुख्यमंत्री ने यह विभाग कृष्णा बायरे गौड़ा को सौंप दिया। इसके बाद रेड्डी की नाराजगी और बढ़ गई। बताया जाता है कि उन्होंने जल संसाधन विभाग स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया था।
इस्तीफा देते हुए क्या बोले रामलिंगा रेड्डी?
मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद रामलिंगा रेड्डी ने स्पष्ट किया कि उनका विवाद पार्टी से नहीं है। उन्होंने कहा कि वह आज भी कांग्रेस के साथ हैं और पार्टी नहीं छोड़ रहे हैं। रेड्डी ने कहा, “मैं पिछले 53 वर्षों से कांग्रेस पार्टी में हूं। मैंने पार्टी में कई जिम्मेदारियां निभाई हैं। मैंने कभी किसी से मंत्री पद की मांग नहीं की।” उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वह पूर्व मुख्यमंत्रियों एम. वीरप्पा मोइली और एस. एम. कृष्णा की सरकारों में भी मंत्री रह चुके हैं। उनके बयान से साफ संकेत मिलता है कि उनकी नाराजगी विभाग आवंटन को लेकर है, न कि कांग्रेस नेतृत्व से।
कांग्रेस नेतृत्व के लिए नई चुनौती
रामलिंगा रेड्डी को कांग्रेस का अनुभवी और प्रभावशाली नेता माना जाता है। उनकी राज्य की राजनीति में मजबूत पकड़ है, खासकर बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों में उनका अच्छा प्रभाव माना जाता है। ऐसे में उनका इस्तीफा मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। नई सरकार बनने के तुरंत बाद इस तरह की असहमति सामने आना विपक्ष को भी सरकार पर निशाना साधने का मौका दे सकता है।
क्या कांग्रेस में बढ़ रही है अंदरूनी नाराजगी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विभागों के बंटवारे के बाद कई नेताओं में असंतोष की भावना हो सकती है। हालांकि अभी तक किसी अन्य मंत्री ने खुलकर नाराजगी जाहिर नहीं की है, लेकिन रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा संकेत देता है कि सरकार के भीतर सब कुछ पूरी तरह सामान्य नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि सत्ता में आने के बाद सबसे बड़ी चुनौती सभी नेताओं को संतुष्ट रखना होती है। डीके शिवकुमार के सामने भी फिलहाल यही चुनौती दिखाई दे रही है।
बेंगलुरु की राजनीति में अहम चेहरा हैं रेड्डी
रामलिंगा रेड्डी को बेंगलुरु क्षेत्र का मजबूत नेता माना जाता है। उन्होंने कई बार विधायक के रूप में जीत हासिल की है और विभिन्न सरकारों में अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं। उनका राजनीतिक अनुभव और संगठन में लंबा योगदान कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि उनके इस्तीफे को सिर्फ एक मंत्री पद छोड़ने की घटना नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
डीके शिवकुमार की अगली रणनीति क्या होगी?
अब सभी की नजर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर टिकी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व जल्द ही रामलिंगा रेड्डी को मनाने की कोशिश कर सकता है। यदि बातचीत के जरिए समाधान नहीं निकला तो यह मामला और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। वहीं विपक्षी दल इस पूरे घटनाक्रम को सरकार के भीतर अस्थिरता और असंतोष का संकेत बता रहे हैं।
आगे क्या होगा?
फिलहाल रामलिंगा रेड्डी ने साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस पार्टी में बने रहेंगे। इससे यह संभावना बनी हुई है कि पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री उनसे बातचीत कर कोई रास्ता निकाल सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि नई सरकार के गठन के तुरंत बाद एक वरिष्ठ मंत्री का इस्तीफा कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस संकट को कैसे संभालती है और क्या रामलिंगा रेड्डी दोबारा सरकार का हिस्सा बनते हैं या नहीं।
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