
भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा में एक बार फिर इतिहास रचा गया है. Harivansh Narayan Singh लगातार तीसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए हैं. 17 अप्रैल 2026 को हुए इस चुनाव में उन्हें निर्विरोध चुना गया, क्योंकि विपक्ष की ओर से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा गया. यह चुनाव सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि यह उस भरोसे और सहमति का प्रतीक था जो उन्हें सभी राजनीतिक दलों के बीच प्राप्त है.
निर्विरोध चुनाव, राजनीतिक सहमति की मिसाल
हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति बनना कई मायनों में खास है. सदन में उनके नाम का प्रस्ताव JP Nadda ने रखा, जबकि इसका समर्थन Mallikarjun Kharge ने किया. इस तरह सत्ता और विपक्ष दोनों का समर्थन उन्हें मिला, जो भारतीय लोकतंत्र में सहमति की राजनीति का एक अच्छा उदाहरण है.
तीसरा कार्यकाल: एक बड़ा मील का पत्थर
हरिवंश ने पहली बार 2018 में राज्यसभा के उपसभापति के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी. इसके बाद उन्होंने दो सफल कार्यकाल पूरे किए और अब तीसरी बार इस पद पर आसीन हुए हैं. उनका यह लगातार कार्यकाल इस बात को दर्शाता है कि उन्होंने सदन के संचालन में संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखी है.
किसके नाम है सबसे बड़ा रिकॉर्ड?
हालांकि हरिवंश का यह रिकॉर्ड बेहद प्रभावशाली है, लेकिन अभी भी सबसे ज्यादा कार्यकाल का रिकॉर्ड Najma Heptulla के नाम है. उन्होंने चार बार इस पद को संभाला था 1985, 1988, 1992 और 1998 में. इस सूची में अब हरिवंश दूसरे स्थान पर आ गए हैं.
नामित सदस्य के रूप में खास पहचान
हरिवंश नारायण सिंह की एक और खास बात यह है कि वह राज्यसभा के एक नामित सदस्य हैं. उन्हें Droupadi Murmu द्वारा उनके पत्रकारिता और सामाजिक योगदान के लिए नामित किया गया था. वे देश के पहले ऐसे नामित सदस्य हैं जो राज्यसभा के उपसभापति बने हैं. यह उनकी योग्यता और अनुभव का प्रमाण है.
पत्रकारिता से राजनीति तक का सफर
हरिवंश का जीवन सफर भी बेहद प्रेरणादायक रहा है. उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे समय तक काम किया और अपनी निष्पक्ष सोच के लिए पहचाने गए. यही अनुभव उन्हें राजनीति में भी एक संतुलित और समझदार नेता बनाता है.
राज्यसभा में भूमिका और योगदान
उपसभापति के रूप में हरिवंश की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. वे सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने, बहस को संतुलित रखने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाते हैं. उनके पिछले कार्यकाल में उन्होंने कई बार जटिल परिस्थितियों को भी शांति और धैर्य से संभाला है.
राजनीतिक विश्वास का संकेत
उनका लगातार तीसरी बार चुना जाना यह भी दर्शाता है कि उन्हें सभी दलों का विश्वास प्राप्त है. आज के समय में जब राजनीति में मतभेद आम हैं, ऐसे में किसी नेता का निर्विरोध चुना जाना एक बड़ी बात है.
आगे का कार्यकाल और उम्मीदें
हरिवंश का यह नया कार्यकाल आने वाले वर्षों में राज्यसभा के कामकाज को और मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि वे 2032 तक इस पद पर रहते हुए संसद की कार्यवाही को और बेहतर बनाएंगे.
भारतीय लोकतंत्र में महत्व
राज्यसभा भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है. यह न सिर्फ कानून बनाने में अहम भूमिका निभाती है, बल्कि विभिन्न राज्यों के हितों की रक्षा भी करती है. ऐसे में उपसभापति का पद बेहद जिम्मेदारी वाला होता है.
हरिवंश नारायण सिंह का तीसरी बार उपसभापति बनना एक बड़ी उपलब्धि है.यह सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत भी है. उनका अनुभव, संतुलन और निष्पक्षता उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त बनाती है. हालांकि नजमा हेपतुल्ला का रिकॉर्ड अभी भी कायम है, लेकिन हरिवंश ने भी अपने नाम एक महत्वपूर्ण स्थान दर्ज कर लिया है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह इस रिकॉर्ड को तोड़ पाते हैं या नहीं. फिलहाल, उनका यह कार्यकाल भारतीय संसद के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है.
Read Related News: लव ट्रैप का जाल और अश्लील वीडियो का खेल, अमरावती वीडियो कांड ने मचाई सनसनी,आरोपी का घर चला बुलडोजर






