
Crude Oil Price: वैश्विक तेल बाजार में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई टिप्पणी के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत एक महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है और 85 डॉलर प्रति बैरल के पार कारोबार करती दिखाई दी। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) में भी मजबूत तेजी देखने को मिली। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ी चिंताओं ने बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिल रहा है।
ट्रंप के बयान के बाद बाजार में बढ़ी हलचल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर कहा कि अमेरिका हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले कार्गो पर 20 प्रतिशत शुल्क लेने की योजना लागू करेगा और इस क्षेत्र में ईरानी जहाजों की नाकाबंदी फिर से शुरू की जाएगी। इस घोषणा के बाद वैश्विक बाजार में तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई। हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में इस मार्ग से जुड़ी किसी भी सैन्य या राजनीतिक गतिविधि का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ता है।
ब्रेंट क्रूड ने छुआ एक महीने का उच्चतम स्तर
मंगलवार सुबह अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स लगभग 84.98 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि कारोबार के दौरान यह 86 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी पहुंचा। दूसरी ओर WTI क्रूड भी लगभग 79.79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। विश्लेषकों के अनुसार सोमवार के निचले स्तर से ब्रेंट क्रूड में लगभग 10 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई, जो हाल के सप्ताहों की सबसे बड़ी बढ़त मानी जा रही है।
क्यों बढ़ी तेल की कीमत?
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल बाजार मुख्य रूप से दो वजहों से प्रभावित हुआ है। पहली वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव है। दूसरी वजह हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है। यदि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
वैश्विक बाजार पर भी दिखा असर
तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहा। यूरोप और अमेरिका के शेयर बाजारों में भी दबाव देखने को मिला। ऊर्जा कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, उद्योगों और निवेशकों के भरोसे पर पड़ सकता है। इसी वजह से कई प्रमुख शेयर सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक तेल महंगा रहता है तो पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और परिवहन लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि घरेलू ईंधन कीमतों पर अंतिम निर्णय तेल कंपनियां और सरकारी नीतियां तय करती हैं।
क्या 90 या 100 डॉलर तक पहुंचेगा तेल?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल स्थिति पर नजर रखना जरूरी है। इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल मैनेजमेंट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जे हैटफील्ड के अनुसार यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति और अधिक नहीं बिगड़ती तो ब्रेंट क्रूड लगभग 80 डॉलर के आसपास स्थिर हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि समुद्री मार्ग सामान्य रूप से खुला रहता है तो भविष्य में कीमतों में नरमी भी आ सकती है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
हॉर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और इराक के तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर देता है।
निवेशकों की बढ़ी चिंता
तेल बाजार के साथ-साथ निवेशक अब अमेरिका और ईरान के बीच आगे होने वाले घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। यदि तनाव और बढ़ता है तो ऊर्जा कीमतों में नई तेजी देखने को मिल सकती है। वहीं यदि कूटनीतिक समाधान निकलता है और समुद्री व्यापार सामान्य रहता है तो बाजार में राहत लौट सकती है।
आगे क्या रहेगा बाजार का रुख?
विश्लेषकों के अनुसार आने वाले दिनों में तेल की कीमतें मुख्य रूप से पश्चिम एशिया की स्थिति, अमेरिकी नीतियों और वैश्विक मांग पर निर्भर करेंगी। निवेशक फिलहाल हर नए घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। किसी भी बड़े राजनीतिक या सैन्य फैसले का असर कच्चे तेल की कीमतों पर तुरंत दिखाई दे सकता है।
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