
Crude Oil Price:अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है.अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्तों के युद्धविराम (सीजफायर) की घोषणा के बाद जहां पहले कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली थी, वहीं अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं.लगातार दूसरे दिन कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है. यह उतार-चढ़ाव बताता है कि वैश्विक तेल बाजार अभी भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है.
सीजफायर के बाद आई थी बड़ी गिरावट
जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ सीजफायर का ऐलान किया था, तब बाजार में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली थी. इस घोषणा के बाद क्रूड ऑयल की कीमतों में 15 से 16 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई थी. ब्रेंट क्रूड करीब 92-95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया था, जबकि WTI क्रूड भी लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया था. यह गिरावट पिछले छह वर्षों में सबसे बड़ी मानी जा रही थी। बाजार को उम्मीद थी कि युद्धविराम से सप्लाई चेन सामान्य होगी और कीमतों में स्थिरता आएगी.
अब क्यों बढ़ रहे हैं तेल के दाम?
हालांकि शुरुआती राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक पाई. सीजफायर के बावजूद बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है, जिसके चलते तेल की कीमतों में फिर से तेजी देखने को मिल रही है. शुक्रवार सुबह WTI क्रूड 0.66 डॉलर बढ़कर 98.53 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड 0.79 डॉलर की तेजी के साथ 96.71 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता नजर आया. यह लगातार दूसरे दिन की बढ़त है, जिसने बाजार को फिर से अस्थिर कर दिया है.
होर्मुज स्ट्रेट बना चिंता का बड़ा कारण
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बनी अनिश्चितता है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है. हालांकि सीजफायर के बाद इसे खोलने की बात कही गई थी, लेकिन जहाजों के आवागमन को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं. अगर इस रास्ते में कोई बाधा आती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है.
मिडिल ईस्ट तनाव का असर बरकरार
इसके अलावा इजरायल-लेबनान के बीच बढ़ते तनाव ने भी बाजार को चिंतित कर दिया है. भले ही अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी शांति बनी हो, लेकिन पूरे क्षेत्र में स्थिरता अभी भी नहीं आई है. यही वजह है कि तेल व्यापारियों और निवेशकों के बीच सतर्कता बढ़ गई है और वे जोखिम को देखते हुए अपने फैसले ले रहे हैं.
निवेशकों में बढ़ी बेचैनी
तेल की कीमतों में इस तरह के उतार-चढ़ाव से निवेशकों में बेचैनी बढ़ गई है. एक ओर जहां गिरावट के बाद खरीदारी का मौका दिख रहा था, वहीं अब तेजी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भू-राजनीतिक स्थिति पूरी तरह स्थिर नहीं होती, तब तक तेल बाजार में इसी तरह की अस्थिरता बनी रह सकती है.
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत जैसे देशों के लिए, जो तेल का बड़ा आयात करते हैं, यह स्थिति चिंता का विषय है. कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है. अगर यह तेजी लंबे समय तक जारी रहती है, तो महंगाई पर भी असर देखने को मिल सकता है.
क्या आगे और बढ़ सकते हैं दाम?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में तेल की कीमतों का रुख पूरी तरह वैश्विक घटनाओं पर निर्भर करेगा. अगर मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है या सप्लाई में कोई बाधा आती है, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं. वहीं, अगर हालात सामान्य होते हैं, तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है.
बाजार की नजरें अब आगे की घटनाओं पर
इस समय तेल बाजार पूरी तरह खबरों और घटनाओं पर निर्भर हो गया है। हर नई जानकारी कीमतों को प्रभावित कर रही है. निवेशक अब अमेरिका, ईरान और मिडिल ईस्ट के अन्य देशों के कदमों पर नजर बनाए हुए हैं.
अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर के बावजूद कच्चे तेल की कीमतों में आई यह तेजी यह दर्शाती है कि बाजार अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है.जहां एक ओर उम्मीद थी कि युद्धविराम से राहत मिलेगी, वहीं दूसरी ओर अनिश्चितता ने फिर से कीमतों को ऊपर धकेल दिया है. अब यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में वैश्विक हालात किस दिशा में जाते हैं और उसका तेल बाजार पर क्या असर पड़ता है. फिलहाल, बाजार में चिंता और सतर्कता दोनों बनी हुई हैं.
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