
Diego Garcia: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी ईरान–अमेरिका युद्ध ने आज एक नई दिशा ले ली है। बता दें कि जब ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डा को मिसाइलों से निशाना बनाया। यह हमला संयुक्त रूप से अमेरिका और ब्रिटेन के लिए बेहद रणनीतिक बेस है, और अब इससे साफ संकेत मिलते हैं कि जंग की आंच अब भारत के पड़ोस तक फैल चुकी है।
क्या हुआ हमला?
ईरान ने शुक्रवार को दो इंटरमीडिएट‑रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जो डिएगो गार्सिया बेस को निशाना बना कर भेजी गई थीं। हालांकि दोनों मिसाइलें लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाईं। जिसमें एक मिसाइल उड़ान के दौरान गलतफॉर्म हो गई और फेल हो गई।वहीं,दूसरी मिसाइल के खिलाफ यूएस ने अपने युद्धपोत से SM‑3 इंटरसेप्टर मिसाइल दाग कर उसे रोकने की कोशिश की। यह स्पष्ट नहीं है कि इंटरसेप्शन पूरी तरह सफल रहा या नहीं। जिसके बाद नतीजा यह रहा कि डिएगो गार्सिया बेस को कोई नुकसान नहीं हुआ।जिससे यह हमला ईरान की अब तक की सबसे बड़ी दूरी की मिसाइल कोशिश माना जा रहा है, क्योंकि डिएगो गार्सिया की दूरी ईरान से लगभग 4,000 किमी से अधिक है।
डिएगो गार्सिया क्यों है इतना अहम?
दरअसल,डिएगो गार्सिया हिंद महासागर में स्थित एक छोटा द्वीप है, जो रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां से अमेरिका और ब्रिटेन अपने ऑपरेशन पूरे एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक चला रहे हैं। इसे भारत के पड़ोस में भी माना जाता है क्योंकि दूरी भारत से करीब 1800–2000 किमी है और हिंद महासागर के बीच कोई बड़ा भूभाग बिच में नहीं आता है।अब ऐसे में यह बेस अमेरिका को लंबी दूरी के रणनीतिक हमलों के लिए एयरफील्ड, लॉजिस्टिक सपोर्ट और फाइटर व बमबाज़ विमान तैनात करने जैसे खुले विकल्प देता है। इसी कारण से यह अमेरिका और ब्रिटेन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
हमले के पीछे क्या वजह?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, ईरान ने यह हमला सिर्फ नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश देने के लिए किया है।
- ईरान ने साफ संकेत दिया कि उसकी मिसाइल क्षमता अब पहले से कहीं अधिक लंबी दूरी तक पहुंच सकती है, जिससे पश्चिमी देशों को सतर्क होना पड़ रहा है।
- यह हमला ब्रिटेन द्वारा अमेरिका को डिएगो गार्सिया और अन्य बेसों का इस्तेमाल करने की अनुमति देने के कुछ घंटों बाद किया गया। जिससे यह माना जा रहा है कि ईरान ने इसे प्रतिशोध या चेतावनी के रूप में अपनाया है।
- ईरान के विदेश मंत्री ने पहले कहा था कि अगर ब्रिटेन अमेरिका को अपने ठिकानों का उपयोग करने देता है, तो वह ब्रिटिश नागरिकों और हितों को खतरे में डालेगा।
ब्रिटेन‑अमेरिका की भूमिका
डिएगो गार्सिया ब्रिटेन के काबू में है लेकिन यह अमेरिका के साथ साझा सैन्य अड्डा है। जिसमें ब्रिटेन सरकार ने हाल ही में अमेरिका को इसके आधार का इस्तेमाल करने की अनुमति दी थी, खासकर उन ठिकानों को निशाना बनाने के लिए जो होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों को नुकसान पहुँचाने वाले ईरानी संगठनों को निशाना बनाने में मदद करेंगे। वहीं, ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने ईरान के इस प्रयास की कड़ी निंदा की और इसे “बेहद खतरनाक और क्षेत्रीय स्थिरता को नुक़सान पहुँचाने वाला” करार दिया।
क्या हमला सफल हो सकता था?
जानकारी के लिए बता दें कि इस हमले में कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन साथ ही इससे कुछ बड़ा सन्देश भी गया। वहीं, अगर ईरान सचमुच अपनी मिसाइलों को 4000 किमी या उससे ज़्यादा दूरी तक निशाना बना सकता है, तो इसका मतलब है कि पश्चिमी यूरोप और अन्य दूरस्थ क्षेत्र भी मिसाइल दायरे में आ सकते हैं। अब ऐसे में इससे स्पष्ट होता है कि ईरान की मिसाइल क्षमता उसके दावे से कहीं आगे हो सकती है, और यह सामरिक ढांचे में बदलाव का संकेत देता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान ने शायद अपनी मिसाइलों में कुछ संशोधन किये हैं ताकि वे लंबी दूरी तक फ़्लाइट कर सकें, और शायद उन्होंने भार घटाकर या तकनीकी संशोधन करके इसे आज़माया है।
भारत पर क्या असर?
डिएगो गार्सिया का भारत के नज़दीक होना इस हमले को और अधिक संवेदनशील बनाता है। जिससे हिंद महासागर में भारत की भूमिका भी बढ़ रही है और यह क्षेत्र भारत के ऊर्जा मार्गों, समुद्री व्यापार और रणनीतिक हितों से जुड़ा है।अब अगर युद्ध की आंच और गहराती है, तो भारत को भी क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री पथ सुरक्षा और कूटनीतिक दबावों से निपटना पड़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य
दरअसल,आज की घटना ने वैश्विक स्थिति को और पेचीदा कर दिया है। इस एक घटना से कई देशों की सुरक्षा रणनीतियाँ बदल सकती हैं।
जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों (ब्रिटेन, यूरोपीय देश) को अब न केवल मध्य पूर्व, बल्कि हिंद महासागर और उससे आगे भी अपनी रणनीति तैयार करनी होगी।ईरान से न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल सकते हैं क्योंकि मिसाइल क्षमता चिन्हित क्षेत्र से बहुत आगे बढ़ सकती है। वहीं,क्षेत्रीय देशों को अब सामरिक, कूटनीतिक तथा क़ानूनी स्तर पर नई सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
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