
US Supreme Court: अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका दिया है। जिसमें अदालत का कहना है कि, ट्रंप के द्वारा लगाए गए टैरिफ गैरकानूनी हैं और प्रेसिडेंट को इसके लिए कोई कानूनी अधिकार नहीं है। बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ट्रंप की व्यापार नीति और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर गहरा असर पड़ सकता है।
जानकारी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया कि ट्रंप ने नेशनल इमरजेंसी के दौरान कॉमर्स को नियंत्रित करने वाले 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का गलत इस्तेमाल किया है। जिसमें अदालत का कहना है कि यह कानून केवल इमरजेंसी के दौरान सामान्य व्यापार को रेगुलेट करने के लिए है, लेकिन इसमें टैरिफ लगाने का अधिकार साफ़ तौर पर नहीं दिया गया।
6 बनाम 3 के बहुमत से आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स के नेतृत्व में 6-3 के बहुमत से यह फैसला सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया जिसमें कहा गया था कि ट्रंप ने बड़े पैमाने पर इंपोर्ट टैक्स लगाने के लिए IEEPA का इस्तेमाल किया और अपने अधिकार का उल्लंघन भी किया। साथ ही, चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने अपने फैसले में लिखा है, राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की अपनी खास ताकत के दावे को सही ठहराने के लिए कांग्रेस से मिली साफ मंजूरी दिखानी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रंप ऐसा नहीं कर सकते।
ट्रंप ने क्यों लगाया था टैरिफ
दरअसल, ट्रंप ने अमेरिका के ट्रेड घाटे को कम करने और अपनी आर्थिक नीतियों को मजबूत करने के लिए अप्रैल 2025 में कई देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लागू किया है। इसमें 25 फीसदी का टैरिफ आम आयात पर लगाया गया और 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ भारत से रूस के कच्चे तेल आयात के कारण लगाया गया। जिसमें ट्रंप ने इस टैरिफ को लागू करने के लिए नेशनल इमरजेंसी पावर्स का हवाला दिया। उनका दावा था कि यह कानून उन्हें इंपोर्ट टैक्स तय करने का अधिकार देता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
ट्रंप की नीति और वैश्विक असर
ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीति और विदेश नीति का यह पहला बड़ा हिस्सा था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर चुनौती दी है। बता दें कि ट्रंप ने भारत, चीन, मेक्सिको और कई अन्य देशों पर भारी टैरिफ लगाए। इस नीति से अमेरिका और कई देशों के बीच ट्रेड वॉर की दिशा बदल गई।
इसमें एक्सपर्ट्स का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल ट्रंप की नीति को कमजोर करेगा बल्कि अमेरिका के इंपोर्टर्स के लिए भी बड़ा आर्थिक बदलाव ला सकता है। साथ ही, अमेरिका को उन इंपोर्टर्स को अरबों डॉलर रिफंड करने पड़ सकते हैं जिन्होंने IEEPA के तहत टैरिफ का भुगतान किया था।
भारत पर प्रभाव
ट्रंप की टैरिफ नीति का सबसे पहले असर भारत पर पड़ा। जिसमें अप्रैल 2025 में लागू हुए 25 फीसदी के रेसिप्रोकल टैरिफ ने भारत के कृषि, मेडिकल डिवाइस और मोटरसाइकिल आयात को प्रभावित किया। वहीं, ट्रंप ने भारत को डेड इकोनॉमी बताते हुए आरोप लगाया है कि भारत ने ट्रेड बैरियर बनाए रखे हैं। हालांकि, भारत और अमेरिका के बीच नई ट्रेड डील के बाद ट्रंप ने भारत पर टैरिफ की दर घटाकर 18 फीसदी कर दी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब भारत और अमेरिका के ट्रेड रिश्तों में और खटास आ सकती है।
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के तौर पर टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस को देता है। जिसमें चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने लिखा कि संविधान बनाने वालों ने किसी भी हिस्से का टैरिफ लगाने का अधिकार एग्ज़ीक्यूटिव ब्रांच को नहीं दिया। जिसमें तीन जज सैमुअल अलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ ने ट्रंप के पक्ष में असहमति जताई है। साथ ही, उन्होंने लिखा है कि टैरिफ नीति समझदारी वाली भी हो सकती है और कानूनी भी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि शांति काल में राष्ट्रपति के पास टैरिफ लगाने का स्वाभाविक अधिकार नहीं है।
कांग्रेस और आम जनता की प्रतिक्रिया
अमेरिकी कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तारीफ भी की है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, ट्रंप की पूरी टैरिफ स्ट्रेटेजी को रद्द करने के लिए US सुप्रीम कोर्ट को सलाम। यह शानदार फैसला है और अमेरिकन सिस्टम में चेक्स एंड बैलेंस अभी भी काम करता है।
हालांकि, पोलिंग से पता चला है कि आम जनता में टैरिफ पॉपुलर नहीं हैं। महंगाई बढ़ने की वजह से वोटरों ने इसे नकारात्मक माना।
भविष्य की संभावना
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ट्रंप की दूसरी पारी के आर्थिक एजेंडा को कमजोर करता है। वहीं, इसके बाद ट्रंप की विदेश और व्यापार नीति पर असर पड़ेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति टैरिफ का हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते।
इसमें एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब अमेरिका को अपने इंपोर्टर्स को रिफंड करने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ सकती है। इससे अरबों डॉलर के व्यापारिक लेन-देन प्रभावित होंगे।
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