
भारत की हवाई और समुद्री ताकत को ऐतिहासिक बढ़त मिलने जा रही है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) की बैठक में भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल मल्टी-रोल फाइटर जेट और भारतीय नौसेना के लिए 6 P-81 समुद्री गश्ती विमानों की खरीद को मंजूरी दे दी गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मेगा डील की अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये है. यह सौदा भारत के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा माना जा रहा है.
हालांकि DAC की मंजूरी के बाद अब इस डील को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) से अंतिम हरी झंडी मिलना बाकी है. CCS की मंजूरी के बाद ही खरीद प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ेगी.
क्या है DAC का फैसला और क्यों है यह इतना बड़ा?
रक्षा अधिग्रहण परिषद Defence Acquisition Council (DAC) भारत में बड़े रक्षा सौदों को मंजूरी देने वाली शीर्ष संस्था है. गुरुवार को राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में 114 राफेल फाइटर जेट की खरीद के लिए Acceptance of Necessity (AoN) यानी जरूरत की औपचारिक मंजूरी दी गई. रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह सौदा पिछले कई महीनों से चर्चा में था और इसे भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा था. मौजूदा समय में वायुसेना के पास स्वीकृत संख्या से कम स्क्वाड्रन हैं, जिससे सीमा पर बढ़ती चुनौतियों के बीच दबाव बढ़ रहा था. 114 नए राफेल के आने से यह कमी काफी हद तक पूरी हो सकेगी.
114 राफेल क्यों हैं जरूरी?
भारतीय वायुसेना पहले ही 36 राफेल फाइटर जेट को अपने बेड़े में शामिल कर चुकी है. इन विमानों ने लद्दाख और पश्चिमी सीमा पर अपनी बेहतर मारक क्षमता और आधुनिक तकनीक से प्रभाव छोड़ा है.
114 राफेल के शामिल होने से:
- वायुसेना की हवाई मारक क्षमता कई गुना बढ़ेगी
- मल्टी-रोल क्षमता के चलते एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड दोनों मिशन मजबूत होंगे
- दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने की क्षमता बढ़ेगी
- सीमाओं पर डिटरेंस (Deterrence) मजबूत होगा
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत को क्षेत्रीय ताकतों के मुकाबले तकनीकी बढ़त देगा.
नौसेना को भी ताकत: 6 P-81 समुद्री गश्ती विमान
DAC की बैठक में सिर्फ वायुसेना ही नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना को भी बड़ी मजबूती देने का फैसला लिया गया है.परिषद ने 6 P-81 समुद्री गश्ती विमानों की खरीद को मंजूरी दी है. P-81 विमान समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों की पहचान, समुद्री निगरानी और लंबी दूरी तक गश्त के लिए बेहद कारगर माने जाते हैं. हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच इन विमानों की जरूरत और भी बढ़ गई है.
इन विमानों के आने से:
- समुद्री सीमाओं की निगरानी और मजबूत होगी
- पनडुब्बी रोधी अभियान (Anti-Submarine Warfare) को बढ़त मिलेगी
- हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी
देश की सुरक्षा में बड़ा निवेश, 3.25 लाख करोड़ की डील
मीडिया रिपोर्ट्स और रक्षा सूत्रों के मुताबिक, 114 राफेल और 6 P-81 विमानों की कुल लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये आंकी जा रही है. यह न सिर्फ भारत का सबसे बड़ा रक्षा सौदा है, बल्कि आने वाले दशकों तक देश की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने वाला कदम भी माना जा रहा है.
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह निवेश सिर्फ हथियार खरीद नहीं, बल्कि देश की रणनीतिक तैयारी और भविष्य की सुरक्षा में किया गया बड़ा दांव है.
अब आगे क्या होगा? CCS की मंजूरी जरूरी
DAC से हरी झंडी मिलने के बाद अगला अहम कदम है कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की मंजूरी.CCS की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं.
CCS की मंजूरी मिलने के बाद:
- विदेशी कंपनियों से औपचारिक बातचीत शुरू होगी
- डिलीवरी टाइमलाइन और मेक इन इंडिया पहल पर चर्चा होगी
- टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और ऑफसेट्स जैसे मुद्दों पर अंतिम फैसला होगा
सरकार इस सौदे में मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को भी बढ़ावा देने की कोशिश कर सकती है, ताकि भारत में मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस से जुड़े रोजगार पैदा हों.
क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर: पड़ोसियों में बेचैनी क्यों?
114 राफेल और P-81 विमानों की खरीद से भारत की सैन्य ताकत में बड़ा इजाफा होगा.इससे क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ना तय माना जा रहा है. रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इस फैसले से पड़ोसी देशों में बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है, क्योंकि भारत की एयर और नेवल पावर पहले से ज्यादा मजबूत हो जाएगी. यह कदम खासतौर पर सीमावर्ती इलाकों में बढ़ते तनाव और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों के बीच रणनीतिक संदेश भी देता है कि भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा.
विपक्ष और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
कुछ रक्षा विशेषज्ञों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह देर से लिया गया लेकिन जरूरी कदम है. वायुसेना की स्क्वाड्रन संख्या को देखते हुए यह खरीद पहले ही हो जानी चाहिए थी. वहीं, कुछ राजनीतिक दलों ने सौदे की कीमत और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाने की बात कही है. हालांकि सरकार का कहना है कि पूरी प्रक्रिया नियमों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर की जाएगी.






