
Krishna Water Dispute: देश के सबसे पुराने अंतरराज्यीय जल विवादों में शामिल कृष्णा नदी जल बंटवारा मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सोमवार को हुई अहम सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई सितंबर के पहले सप्ताह तक स्थगित कर दी। हालांकि सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की एक टिप्पणी सबसे अधिक चर्चा में रही। उन्होंने कहा, “मैं इस मामले का फैसला किए बिना एग्जिट डोर नहीं देखूंगा।” अदालत की इस टिप्पणी को मामले के शीघ्र समाधान की मंशा के रूप में देखा जा रहा है। यह मामला केवल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना तक सीमित नहीं है, बल्कि कृष्णा नदी के जल बंटवारे से जुड़े व्यापक कानूनी और प्रशासनिक प्रश्नों से भी जुड़ा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के हित भी इस पूरे विवाद से प्रभावित होते हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला भविष्य की जल वितरण व्यवस्था पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में आंध्र प्रदेश ने केंद्र सरकार की वर्ष 2023 की अधिसूचना को चुनौती दी है। यह अधिसूचना अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत कृष्णा नदी जल विवाद को लेकर जारी की गई थी। आंध्र प्रदेश का कहना है कि यह अधिसूचना आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 में निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। राज्य का तर्क है कि 2014 में संयुक्त आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद जल बंटवारे की प्रक्रिया उसी कानून के तहत तय होनी चाहिए थी और नई अधिसूचना उस व्यवस्था को प्रभावित करती है।
आंध्र प्रदेश ने क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान आंध्र प्रदेश की ओर से कहा गया कि राज्य के पुनर्गठन के बाद कृष्णा नदी के जल के बंटवारे के लिए संसद ने पहले से ही स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाई थी। राज्य ने यह भी कहा कि कृष्णा नदी के ऊपरी हिस्से से जुड़े राज्यों—कर्नाटक और महाराष्ट्र—के जल उपयोग से संबंधित कई पहलुओं पर पहले ही निर्णय लिए जा चुके हैं। ऐसे में यदि केंद्र सरकार की 2023 की अधिसूचना लागू होती है तो आंध्र प्रदेश के जल अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
किस पीठ ने की सुनवाई?
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. एम. पंचोली (Vipul M. Pancholi) की तीन सदस्यीय पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की प्रारंभिक दलीलें सुनीं और कहा कि मामले की विस्तृत सुनवाई सितंबर के पहले सप्ताह में की जाएगी।
CJI सूर्यकांत की टिप्पणी क्यों बनी चर्चा?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि वह इन दिनों सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के गठन से जुड़े कार्यों में व्यस्त हैं। इसके बावजूद उन्होंने स्पष्ट किया कि कृष्णा जल विवाद जैसे महत्वपूर्ण मामले को लंबित नहीं रहने दिया जाएगा।
उन्होंने कहा, “मैं इस मामले का फैसला किए बिना एग्जिट डोर नहीं देखूंगा।”
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस टिप्पणी का अर्थ यह है कि मुख्य न्यायाधीश चाहते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान इस महत्वपूर्ण विवाद पर सुनवाई आगे बढ़े और समाधान की दिशा में ठोस प्रगति हो। हालांकि यह एक मौखिक टिप्पणी थी, अदालत का अंतिम निर्णय विस्तृत सुनवाई के बाद ही आएगा।
सितंबर में फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सितंबर के पहले सप्ताह में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई में अदालत आंध्र प्रदेश, केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनेगी। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि 2023 की अधिसूचना संवैधानिक और कानूनी रूप से वैध है या नहीं।
कृष्णा नदी विवाद क्यों है महत्वपूर्ण?
कृष्णा नदी दक्षिण भारत की प्रमुख नदियों में से एक है। इसका जल महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के लाखों लोगों की पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करता है। इसी कारण इस नदी के जल बंटवारे को लेकर कई दशकों से विवाद चलता रहा है। समय-समय पर कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (Krishna Water Disputes Tribunal – KWDT) का गठन किया गया और विभिन्न राज्यों के हिस्से तय किए गए।
2023 की अधिसूचना पर विवाद
अक्टूबर 2023 में केंद्र सरकार ने कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण-II को अतिरिक्त संदर्भ (Additional Terms of Reference) सौंपने का निर्णय लिया था। सरकार का कहना था कि इससे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच लंबे समय से लंबित विवाद के समाधान में मदद मिलेगी। वहीं आंध्र प्रदेश का दावा है कि इस कदम से पुनर्गठन अधिनियम के तहत पहले से निर्धारित व्यवस्था प्रभावित होती है।
तीन राज्यों पर पड़ेगा असर
हालांकि वर्तमान याचिका मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच है, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच कृष्णा नदी के जल बंटवारे की व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। सिंचाई परियोजनाओं, पेयजल योजनाओं और जल प्रबंधन से जुड़े कई फैसले भी अदालत के अंतिम आदेश पर निर्भर करेंगे।
जल विवादों का समाधान क्यों जरूरी?
भारत में कई बड़ी नदियां एक से अधिक राज्यों से होकर गुजरती हैं। बढ़ती आबादी, सिंचाई की जरूरत और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अंतरराज्यीय जल विवादों का समय पर समाधान न केवल राज्यों के बीच बेहतर समन्वय के लिए जरूरी है, बल्कि कृषि, उद्योग और पेयजल सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
आगे क्या होगा?
सितंबर में होने वाली अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इस मामले की विस्तृत कानूनी समीक्षा करेगा। अदालत यह भी देखेगी कि 2023 की अधिसूचना आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 और अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अनुरूप है या नहीं। यदि अदालत किसी पक्ष के तर्कों को स्वीकार करती है, तो इसका असर भविष्य में कृष्णा नदी के जल वितरण और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है।
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